Ab aage...
सरवंश जब कमरे से बाहर निकला, तो उसका पूरा शरीर गुस्से, हताशा और एक अनजाने डर से काँप रहा था। रव्या की आँखों में मौत की चाहत और उसके शब्द"आपने मेरी रूह को मार डाला"उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे।
वह अपनी इस बेबसी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। सीढ़ियों से उतरते हुए उसकी मुट्ठियाँ इतनी कसी हुई थीं कि उसके नाखून उसकी अपनी हथेलियों में चुभ रहे थे।
तभी नीचे डाइनिंग हॉल में कदम रखते ही उसका सामना उसकी माँ और बड़ी चाची से हुआ। हॉल में नौकर-चाकर भी मौजूद थे। सरवंश को नीचे आते देख गायत्री देवी के चेहरे पर कड़वाहट और नफ़रत के भाव साफ उभर आए।
"आ गए तुम, सरवंश?" गायत्री देवी ने ऊंची और ताने भरी आवाज़ में कहा। "हॉस्पिटल का ड्रामा कम था जो अब उस लड़की के सामने सूप के कटोरे लेकर घूम रहे हो? पूरा शहर बातें कर रहा है कि राठौड़ खानदान का इकलौता वारिस एक ऐसी लड़की के तलवे चाट रहा है जिसका न कोई दीन है, न धरम। देखो उसकी हालत, सुबह उठकर बड़ों के पैर छूना तो दूर, अभी तक कमरे में मुंह छुपाकर पड़ी है। ऐसी बदचलन और मनहूस लड़की को..."
"माँ...!!!"
सरवंश की एक खौफनाक, गरजती हुई दहाड़ पूरे हॉल में गूँज उठी। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ और कड़क थी कि डाइनिंग टेबल पर रखे काँच के गिलास थरथरा गए। हॉल में खड़े नौकर डर के मारे अपनी जगह पर जम गए। गायत्री देवी भी अपने बेटे का यह रूप देखकर एक पल के लिए सहम गईं। सरवंश की आँखें इस वक्त खून की तरह लाल थीं और उसके चेहरे पर एक जंगली शिकारी जैसी क्रूरता थी।
वह तेजी से डाइनिंग टेबल के पास आया। उसके अंदर का सारा गुस्सा, जो वह ऊपर कमरे में रव्या पर नहीं निकाल पाया था, अब ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा। उसने एक ही झटके में डाइनिंग टेबल पर बिछी चादर को खींचा, जिससे उस पर रखी हज़ारों की कीमती क्रॉकरी, काँच के बर्तन और नाश्ता फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गए।
काँच के टुकड़े पूरे फर्श पर बिखर गए। सरवंश ने अपनी माँ की तरफ उंगली उठाई, उसकी आवाज़ में एक ठंडी और जानलेवा कशिश थी:
"मैंने कल रात भी कहा था और आज आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूँ। रव्या इस घर की बहू है या नहीं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वह मिस्टर सरवंश सिंह राठौड़ की पत्नी है। इस हवेली में जो कुछ भी है, वह मेरी बदौलत है। और जो चीज़ मेरी है, उसके खिलाफ अगर किसी ने भी, चाहे वह आप ही क्यों न हों माँ, एक शब्द भी बोला... तो मैं इस हवेली को श्मशान बनाने में एक सेकंड भी नहीं लगाऊँगा।"
उसने अपनी चाची और बाकी नौकरों की तरफ घूरते हुए कहा, "अगर आज के बाद किसी ने भी रव्या की तरफ आँख उठाकर देखा, या उसे नीचा दिखाने की कोशिश की, तो मैं उसका वो अंजाम करूँगा कि तुम्हारी आने वाली नस्लें भी काँप उठेंगी। वह इस घर की अकेली मालकिन है। उसके पैरों की धूल बनने की औकात भी नहीं है इस घर में किसी की।"
गायत्री देवी गुस्से और अपमान से थर-थर काँपने लगीं, लेकिन सरवंश के खौफ के आगे उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।
सरवंश ने अपने एक वफादार गार्ड को बुलाया और आदेश दिया, "कमरे के बाहर दो गार्ड्स तैनात करो। बिना मेरी इजाजत के ऊपर कोई नहीं जाएगा, यहाँ तक कि माँ भी नहीं। और अगर रव्या को किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो वह तुरंत पूरी होनी चाहिए।"
इतना कहकर सरवंश ने अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और हवेली से बाहर निकल गया। उसे इस वक्त खुली हवा की ज़रूरत थी, क्योंकि हवेली का माहौल और रव्या की टूटती हुई हालत उसे अंदर ही अंदर पागल बना रही थी।
To be continued🌚
अगले भाग में: सरवंश के जाने के बाद, क्या रव्या की हालत और बिगड़ेगी? जब डॉक्टर दोबारा चेकअप के लिए आएंगे, तो सरवंश को कौन सा नया झटका लगेगा? कमेंट में बताएं!






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